चंडीगढ़ : हरियाणा और पंजाब की राजनीति का केंद्र बन चुकी सतलुज-यमुना लिंक (SYL) एक बार फिर से सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद हरियाणा को उसके हिस्से का पानी देने से इंकार कर चुका पंजाब किसी भी सूरत में हरियाणा को पानी नहीं देना चाहता। इसके बावजूद सतलुज यमुना लिंक (SYL) नहर विवाद को सुलझाने के लिए पंजाब और हरियाणा एक बार फिर बातचीत की मेज पर आने को तैयार हैं। केंद्र सरकार के निमंत्रण के बाद 9 जुलाई को दिल्ली में नहर के निर्माण के मुद्दे पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक होगी। इस बैठक की अगुवाई केंद्र सरकार करेगी, जिसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल मौजूद रहेंगे। दोनों ही राज्य इस मीटिंग में मजबूती से अपना-अपना पक्ष रखने की तैयारी कर रहे हैं। दोनों मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने अधिकारियों को अब तक हुई सभी बैठकों का ब्योरा और संबंधित दस्तावेज तैयार करने के निर्देश दिए हैं, ताकि वे प्रभावी ढंग से अपनी बात रख सकें।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और मध्यस्थता
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी लगातार दखल दे रहा है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर पंजाब और हरियाणा को केंद्र के साथ सहयोग करके मामले को सुलझाने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले केंद्रीय जल शक्ति मंत्री को इस मामले में मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया था और उनसे कहा था कि वे केवल ‘मूक दर्शक’ बने रहने के बजाय सक्रिय भूमिका निभाएं ताकि इस दशकों पुराने विवाद का कोई समाधान निकल सके।
SYL विवाद का पूरा मामला
1982 से ठंडे बस्ते में SYL: यह विवाद 214 किलोमीटर लंबी सतलुज यमुना लिंक (SYL) नहर के निर्माण से संबंधित है। इस नहर का 122 किलोमीटर हिस्सा पंजाब में और 92 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा में बनाया था। हरियाणा ने अपने हिस्से का निर्माण पूरा कर लिया, जबकि पंजाब ने 1982 में परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यह मामला मूल रूप से 1981 का है, जब दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे पर समझौता हुआ था व बेहतर जल वितरण के लिए SYL नहर बनाने का निर्णय लिया था।
सुप्रीम कोर्ट पंजाब के कानून को कर चुका है खारिज
जनवरी 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के पक्ष में फैसला सुनाया और पंजाब से समझौते की शर्तों के अनुसार नहर बनाने को कहा। लेकिन, पंजाब विधानसभा ने 2004 में 1981 के समझौते को समाप्त करने के लिए एक कानून पारित कर दिया। पंजाब के 2004 के इस कानून को 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया था। तब से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में अटका हुआ है। इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 13 अगस्त, 2025 तय है।
SC ने लगाई थी पंजाब को फटकार
6 मई, 2025 को इस मामले में सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गवई ने पंजाब सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। उन्होंने कहा था कि “यह मनमानी नहीं तो क्या है? नहर बनाने का आदेश पारित होने के बाद, इसके निर्माण के लिए अधिगृहीत जमीन को गैर-अधिसूचित कर दिया गया। यह कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने की कोशिश है। यह मनमानी का स्पष्ट मामला है।” जस्टिस गवई ने इस बात पर जोर दिया था कि इस परियोजना से तीन राज्यों को मदद मिलनी चाहिए थी, लेकिन भूमि का अधिग्रहण करने के बाद उसे गैर-अधिसूचित कर दिया गया।
SYL न बनने से हरियाणा को भारी नुकसान
सतलुज यमुना लिंक (SYL) नहर के न बनने से हरियाणा को अब तक भारी आर्थिक और कृषि संबंधी नुकसान हुआ है। अनुमान है कि हरियाणा को अब तक 19 हजार 500 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। 46 साल से सिंचाई का पानी नहीं मिलने के कारण दक्षिण हरियाणा की लगभग 10 लाख एकड़ कृषि भूमि बंजर होने के कगार पर पहुंच गई है। सबसे अहम बात यह है कि पानी के अभाव में राज्य को हर साल 42 लाख टन खाद्यान्न का भी नुकसान हो रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई एक मुलाकात के दौरान ये आंकड़े प्रस्तुत किए थे। उन्होंने बताया था कि यदि 1981 के समझौते के अनुसार 1983 में SYL नहर बन जाती, तो हरियाणा 130 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्नों और अन्य अनाजों का उत्पादन कर सकता था। यह बैठक दशकों पुराने विवाद को सुलझाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।




