Sarva Pitru Amavasya 2025: सनातन परंपरा में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। यह सोलह दिनों की अवधि हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक रहती है। इस काल को पितरों को स्मरण करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने का समय माना जाता है। शास्त्रों में वर्णन है कि पितरों का पूजन-स्मरण करने से वे प्रसन्न होकर वंशजों को सुख, समृद्धि और आयुष्य का आशीर्वाद देते हैं। कई बार ऐसा होता है कि किसी जातक को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं रहती या किसी कारणवश उसका स्मरण नहीं रहता। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पितरों का श्राद्ध कब करना उचित होगा ? आज हम आपको इसके बारे में विस्तार से जानकारी देंगे।
सर्वपितृ अमावस्या का महत्व
पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है। यह तिथि अत्यंत पावन और विशेष मानी जाती है, क्योंकि इसे उन सभी पितरों को समर्पित किया गया है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश नियत दिन पर नहीं हो सका। शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से समस्त पितरों की आत्मा तृप्त होती है। इसलिए इसे “सर्वपितृ अमावस्या” अर्थात सभी पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाली अमावस्या कहा गया है।
सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण अर्पित करने का समय
हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन माह की अमावस्या तिथि की शुरुआत 21 सितंबर, को रात 12 बजकर 16 मिनट पर होगी। वहीं इसका समापन 22 सितंबर को देर रात 01 बजकर 23 मिनट पर होगा। पंचांग को देखते हुए इस साल सर्वपितृ अमावस्या दिन रविवार, 21 सितंबर को मनाई जाएगी।
किनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है ?
सर्वपितृ अमावस्या पर विशेष रूप से उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है।
-जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो।
-जिनका नियत तिथि पर श्राद्ध न हो सका हो।
-जिनके वंशज दूर रहते हैं और समय पर अनुष्ठान न कर पाए हों।
-संन्यासी, साधु और वे लोग जिनकी तिथि या वंश परंपरा ज्ञात न हो।
अतः इस दिन किया गया श्राद्ध सभी पितरों तक पहुँचता है और उन्हें तृप्त करता है।
श्राद्ध से होने वाले लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब पितर प्रसन्न होते हैं तो परिवार में धन, वैभव, संतान सुख और उन्नति की वृद्धि होती है। यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में पितृ दोष हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण करने से उसका प्रभाव कम हो जाता है।
श्राद्ध की विधि
इस दिन प्रातःकाल स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करने चाहिए। पितरों का स्मरण करते हुए कुश, तिल और जल अर्पित कर तर्पण करें। पिंडदान करते समय जौ, तिल और चावल का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना और दक्षिणा देना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितर तृप्त होते हैं। परिवार के सदस्य भी इस अवसर पर सात्विक भोजन ग्रहण करें और पितरों का आशीर्वाद स्मरण करें।
बरसेगी पितरों की कृपा
सर्वपितृ अमावस्या तिथि को ही पितृपक्ष का समापन हो जाता है और पूर्वज पितृलोक को लौट जाते हैं। सर्वपितृ अमावस्या के दिन भूले-बिसरे सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है। इस दिन किए जाने वाले कुछ ऐसे कार्य भी हैं जो पितरों की कृपा आपको दिलाते। सर्वपितृ अमावस्या के दिन आपको भूले-बिसरे पितरों के साथ ही उन पितरों का श्राद्ध भी करना चाहिए जिनकी मृत्यु तिथि आपको ज्ञात न हो, आपके द्वारा किए गए श्राद्ध, तर्पण से पितरों की कृपा आपको मिलती है और पितृ दोष से भी मुक्ति मिल जाती है।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन आपको पितरों का स्मरण करते हुए दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन सफेद वस्त्र, अन्न और धन का दान करने से आपके पितृ प्रसन्न होकर वापस लौटते हैं। पितरों के निमित्त इस दिन दीपदान भी आपको करना चाहिए। आप पवित्र नदियों में पितरों को याद करते हुए दीपदान कर सकते हैं। वहीं घर की दक्षिण दिशा में चौमुखी दीपक जलाने से भी पितरों की कृपा आप पर बरसती है।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन आपको पितरों से अपनी भूल चूक के लिए भी माफी मांगनी चाहिए। ऐसा करने से रूठे पितृ भी प्रसन्न हो जाते हैं। साथ ही इस दिन आपको ब्राह्मण, कौआ, कुत्ता, गाय, चींटी आदि को अन्न भी अवश्य देना चाहिए। ऐसा करने से भी पितरों का असीम आशीर्वाद आप पर बरसता है।




