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हरियाणा में पहले से महंगा होगा मकान खऱीदना, सरकार ने नए Collector Rate को मंजूरी दी

Big update regarding registry : हरियाणा में होने वाली जमीन, मकान और दुकान आदि की खरीद-फरोख्त को लेकर सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। हरियाणा सरकार ने प्रदेश में जमीन की खरीद-फरोख्त के लिए एक अग्सत 2025 से नए कलेक्टर रेट (Collector Rate) लागू करने का फैसला किया है। इसे लेकर राजस्व विभाग की ओर से सभी मंडलायुक्त और डीसी (DC) को आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। अब हरियाणा में कोई भी घर, दुकान या जमीन खरीदेगा या बेचेगा, तो उसे पहले से ज्यादा पैसे चुकाने पड़ सकते हैं। इससे पहले मार्च 2025 तक पुराने संशोधित रेट लागू थे, जिनकी वैधता खत्म होने के बाद भी रजिस्ट्रियां उन्हीं दरों पर जारी थीं।

राजस्व में बढ़ोतरी के लिए उठाया कदम

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राज्य सरकार का मानना है कि कलेक्टर रेट (Collector Rate) बढ़ाकर न केवल राजस्व में बढ़ोतरी होगी, बल्कि जमीनों की खरीद-फरोख्त में पारदर्शिता भी आएगी। नए रेट लागू होने से रजिस्ट्री प्रक्रिया में मिलने वाले स्टांप शुल्क में वृद्धि होगी, जिससे आम आदमी को ज्यादा भुगतान करना पड़ेगा। विभागीय सूत्रों के मुताबिक इस बार जमीन के कलेक्टर रेट में 5 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी प्रस्तावित है, जो क्षेत्र विशेष के आधार पर अलग-अलग होगी। कलेक्टर रेट वो सरकारी कीमत होती है, जिस पर किसी भी संपत्ति (जैसे प्लॉट, मकान) की रजिस्ट्री (खरीद-बिक्री का सरकारी कागज) होती है।

महंगी होगी प्रॉपर्टी

हरियाणा के कईं शहर ऐसे हैं, जहां पहले ही जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहां कलेक्टर रेट (Collector Rate) की बढ़ोतरी का सीधा असर प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन पर पड़ेगा। बीते वर्षों में कईं क्षेत्रों में 20 से 30 प्रतिशत तक की दरों में बदलाव हो चुका है। अब एक बार फिर बढ़ोतरी से इन इलाकों में संपत्ति खरीदना और अधिक महंगा हो जाएगा।

अप्रैल से होना था बदलाव

पिछले साल चुनाव आचार संहिता के चलते सरकार एक जनवरी और एक दिसंबर को ही नए कलेक्टर रेट लागू कर पाई थी। इस साल भी अप्रैल से दरों में बदलाव की योजना थी, मगर मार्च में हुए संशोधन प्रस्ताव को मुख्यमंत्री नायब सैनी ने फिलहाल स्थगित कर दिया था। अब राजस्व में संभावित नुकसान को देखते हुए सरकार ने दोबारा प्रक्रिया शुरू कर दी है।

स्थानीय स्तर पर होती है समीक्षा

कलेक्टर रेट तय करने की प्रक्रिया पूरी तरह स्थानीय प्रशासन के अधीन होती है। हर जिले में शहर और गांव के हिसाब से बाजार भाव को ध्यान में रखते हुए इन दरों का निर्धारण होता है। यही न्यूनतम रेट सरकारी रजिस्ट्रेशन के लिए मान्य माने जाते हैं।

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