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Pitru Paksha 2025: पितृपक्ष में इऩ स्तोत्रों का पाठ करने से मिलेगी पितरों की कृपा !

Pitru Paksha : पितृपक्ष हिंदू धर्म का वह पवित्र काल है जब वंशज अपने पितरों को तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध द्वारा स्मरण करते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस समय पितरों को प्रसन्न करने से उनके आशीर्वाद से परिवार की सभी बाधाएं दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। यही कारण है कि पितृपक्ष में केवल दान-पुण्य ही नहीं बल्कि विशेष स्तोत्र पाठ का भी महत्व बताया गया है। खासकर पितृ स्तोत्र और स्वधा स्तोत्र का पाठ करने से पितर अति प्रसन्न होकर वंशजों पर कृपा बरसाते हैं।

इसलिए जरूरी है स्तोत्र पाठ ?

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धर्मशास्त्रों के अनुसार पितर जब तक तृप्त नहीं होते, तब तक परिवार में शांति और समृद्धि नहीं टिकती। भोजन, जल और तिल अर्पण से उनकी तृप्ति होती है, जबकि स्तोत्र पाठ से उन्हें आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि गरुड़ पुराण और अग्नि पुराण में पितृ स्तोत्र और स्वधा स्तोत्र का महत्व विस्तार से बताया गया है।

पितृ स्तोत्र का महत्व

पितृ स्तोत्र पितरों को स्मरण कर उनकी कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है। यह स्तोत्र बताता है कि हमारी हर उपलब्धि, धन और सुख-संपदा का मूल कारण पितरों का आशीर्वाद ही है।

पितृ स्तोत्र

ॐ नमोऽस्तु पितृभ्यः पितामहेभ्यः प्रपितामहेभ्यश्च नमः

येषां प्रसादात् सुखमाप्नोमि येषां प्रसादात् धनधान्यप्राप्तिः

तेषां प्रसादेन भवेत् पितृकृपा, तस्मात्सदा पूज्याः पितरः

भावार्थ हे पितरों! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। आपकी कृपा से ही हमें सुख, धन और अन्न की प्राप्ति होती है। आपकी कृपा से जीवन सफल बनता है और वंश की उन्नति होती है।

स्वधा स्तोत्र और उसका महत्व

पितृ तर्पण का अंतिम शब्द स्वधा* होता है, जो पितरों तक सभी अर्पण पहुंचाने वाली देवी का नाम है। स्वधा देवी को प्रसन्न किए बिना पितरों को तर्पण पूर्ण नहीं माना जाता।

स्वधा स्तोत्र

स्वधा नमस्तुभ्यं सर्वपितृप्रियायै

पितृलोकस्य द्वाराय दयास्वरूपिण्यै नमः

त्वत्प्रसादेन पितरः तृप्तिमायान्ति

त्वं हि तेषां वन्द्या, त्वं हि तेषां मोक्षदायिनी

भावार्थ हे स्वधा देवी! आपको नमस्कार है। आप ही पितरों की प्रिय हैं और पितृलोक का द्वार हैं। आपके प्रसाद से पितर तृप्त होते हैं और आपकी कृपा से उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।

इस प्रकार करें पाठ

सूर्योदय के बाद स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात पूर्व दिशा की ओर कुशासन पर बैठकर पितरों का स्मरण करें। अपने सामने जल, तिल और पका हुआ अन्न रखें। पहले पितृ स्तोत्र का पाठ करें और फिर स्वधा स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के बाद ॐ पितृदेवाय नमः, स्वधायै नमः कहकर जल अर्पित करें।

पितृपक्ष में पितरों को केवल भोजन और तर्पण अर्पित करना ही पर्याप्त नहीं है। यदि इसके साथ श्रद्धा से पितृ स्तोत्र और स्वधा स्तोत्र का पाठ किया जाए, तो पितरों की आत्मा तृप्त होती है और उनका आशीर्वाद वंश पर सदैव बना रहता है। यही आशीर्वाद संतान सुख, समृद्धि और जीवन की हर सफलता का आधार है।

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